- रात को जल्दी सोए और प्रात:कल जल्दी उठें। प्रतिदिन सूर्योदय से डेढ़ घंटा पूर्व उठें।
- शौच करते समय दांतों को भींचकर कर रखने से वृद्धावस्था में भी दांत नहीं हिलते।
- प्रातः उठकर 23 गिलास गुनगुना पानी पियें। गुनगुना पानी में आधा नींबू का रस एवं एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से विशेष लाभ होता है। सुबह खाली पेट चाय व कॉफी का सेवन कभी भी न करें।
- प्रातः मुँह में पानी भरकर ठंडे जल से आंखों में छींटे मारें। अँगूठे से मुंह में स्थित तालू की सफाई करने से आँख,कान,नाक एवं गले के रोग नहीं होते।
- स्नान करने से पूर्व दोनों पैरों के अंगूठों में सरसों का शुद्ध तेल मलने से वृद्धावस्था तक नेत्रों की ज्योति कमजोर नहीं होती। प्रातः नंगे पांव हरी घास पर टहलें, इससे आंखों की रोशनी बढ़ती है। सप्ताह में एक दिन पूरे शरीर की सरसों के तेल से मालिश करें तथा पैर के अंगूठों व पैर के पंजों की भी मालिश करें।
- दांतों को साफ करने के लिए नीम या बबूल की दातुन का प्रयोग करें तथा रात्रि को सोने से पहले तथा प्रत्येक बार भोजन लेने के बाद दांतों के बीच में फंसे अन्न-कणों को ब्रश से साफ करें।
- नहाने के पानी में नींबू का रस मिलाकर नहाने से शरीर की दुर्गंध दूर होती है।
- प्रतिदिन शौच-स्नान के पश्चात किसी नजदीकी योगकक्षा में योग, योगासन, प्राणायाम आदि नियमित रुप से करें। प्राणायाम करने से सभी प्रकार के रोग दूर होते हैं तथा शरीर स्वस्थ तथा मन शांत रहता है और आत्मबल बढ़ता है।
- नाश्ते में हल्का तथा रेशेयुक्त खाद्य, अंकुरित अन्न, फलों व दलिये का इस्तेमाल करें
- भोजन के उपरांत कम से कम 10 मिनट तक वज्रासन में बैठें तथा यदि संभव हो तो रात्रि के भोजन के बाद थोड़ा भ्रमण करें।
- दिन में कम से कम 8 से 12 गिलास (2.5 से 3 लीटर) पानी जरूर पियें।
- सदैव रीड (कमर) को सीधी रखकर बैठें। जमीन पर बैठकर बगैर सहारे के उठें। नाखूनों को दांत से कभी न काटें।
- खाने के दौरान पानी न पीयें। खाने के आधा घंटा पहले तथा आधा घंटे बाद पानी का सेवन करें। सदैव पानी घूंट-घूंट करके पियें।
- शाकाहारी, सुपाच्य, सात्विक भोजन भूख लगने पर ही चबा-चबा कर खाएं। फास्ट-फूड, कोल्डड्रिंक्स, धूम्रपान, मांस-मदिरा का प्रयोग कभी भी न करें।
- कम खाएं, जीवन जीने के लिए खाएं, ना की खाने के लिए जियें। अपने आमाशय का आधा भाग भोजन, चौथाई भाग पानी तथा शेष चौथाई वायु के लिए रखें।
- भोजन हमेशा धरती पर बैठकर ही करें। खूब चबा-चबा कर खायें। भोजन करते समय मौन रहें, पूरा ध्यान खाने पर ही रखें। भोजन करते समय टेलीविजन न देखें।
- पानी हमेशा बैठकर ही पीयें, खड़े होकर पीने से घुटनों में दर्द (वात- रोग) होने लगता है।
- भोजन से पूर्व भी ईश्वर का स्मरण करें तथा भोजन को ईश्वर का प्रसाद मान कर ग्रहण करें।
- भोजन में हरी सब्जी व सलाद का अधिक से अधिक प्रयोग करें। अधिक गर्म व ठंडी वस्तुएं पाचन क्रिया के लिए हानिकारक है।
- भोजन में मिर्च मसालों का प्रयोग कम करें। प्रतिदिन मौसम के फलों का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए अति उत्तम है। फलों को भोजन के साथ न लेकर अलग से भोजन से पहले खाएं।
- खाने के पश्चात लघुशंका अवश्य करें। भोजन के तुरंत बाद आइसक्रीम न खाएं।
- रात का खाना सोने से 2 घंटे पहले खाएं, खाने में बाद थोड़ी चहलकदमी करें खाने के तुरंत बाद में लेटें। बिना तकिया के सोने से हृदय और मस्तिष्क मजबूत होता है।
- सांस हमेशा नाक से ही ले वह छोड़े। ईश्वर ने मुख खाने के लिए दिया है। मुख से सांस नहीं लेना चाहिए
- फल सब्जियों का प्रयोग छिलके सहित दो कर करें। छिलके वाली दालों का ही सेवन करें।
- शरीर की शुद्धि के लिए सप्ताह में एक दिन बिना कुछ खाए केवल पानी पीकर उपवास अवश्य रखें।
- मल-मूत्र, छींकें आदि के वेगों को कभी नहीं रोकना चाहिए, वेग रोकने से रोग उत्पन्न होते हैं।
- सोने के लिए अधिक नरम बिस्तर का प्रयोग न करें। डनलप के गद्दे का प्रयोग हानिकारक है।
- रात को 10:00 से 4:00 बजे तक सोने से 6 घंटे की नींद पूरी हो जाती है। ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर दिन में कभी भी न सोऐं।
- उत्तर तथा पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने वालों की आयु क्षीण होती है। पूर्व तथा दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने वालों की आयु दीर्घ होती है।
- पीने का पानी एवं अन्य खाद्य पदार्थ भी स्वच्छ होने चाहिए क्योंकि अस्वच्छता से अनेक रोगों की उत्पत्ति होती है।
- नशीले पदार्थों के सेवन से तन, मन, धन, धर्म व आत्मा की हानि एवं अपनी तथा परिवार की बदनामी होती है।
- हर परिस्थिति में सदैव प्रसन्न एवं उत्साहित रहें। उत्साह का परिणाम है सफलता तथा निराशा का परिणाम आत्महत्या होता है। प्रसन्नता स्वास्थ्य की सबसे बड़ी कुंजी है। हर रोज खुलकर खिलखिलाकर हंसे हंसना ही जीवन है।
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